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२६ फेब्रुवारी २०२०

कोरोना कि अफवा ने लगाया पोल्ट्री को ६०० करोड का चुना:कोण लुट रहा है पोल्ट्री फार्मर को?

नागपूर/संवाददाता:
चीन में कहर बरपाने वाले कोरोना वायरस का असर भारत में अंडे और चिकन की कीमतों पर दिख रहा है।  देश में चिकन और अंडे की थोक कीमतों में काफी कमी आई है। 

"मुर्गी और अंडे के माध्यम से वायरस के प्रसार के बारे में सोशल मीडिया के जरिये गलत सूचनाएं फैलाने से पिछले चार महीनों में अंडे और चिकन की कीमतों में भारी गिरावट आई है। 
कोरोना के नाम पे मुर्गी ब्यापारी और
 चिल्लर विक्रेता कमा रहे है पैसा?
भारत कि पोल्ट्रीफीड बनाने वाली मशहूर कंपनी "न्यूट्रीक्राफ्ट फीड" के महाराष्ट्र के विदर्भ रिजन के विक्री अधिकारी ललित लांजेवार ने बताया कि कोरोना कि अफवा आणे के पहिले ब्रायलर मुर्गी ७० से ७५ रुपया किलो तो कभी ८० रुपया के भाव से होलसेल फार्म खरेदी कि जा रही थी।  लेकीन कोरोना कि अफवा ने भारत के पोल्ट्री बाजार को ऐसे चपेट मे लिया कि होलसेल फार्म खरेदी का रेट ७०,७५,८०,से सिधा ३० रुपया किलो हो गया। तो ऐसे हि कॉकरेल और गावरान मुर्गी कि खरेदी भी कोरोना कि अफवा आणे के पहिले १४० रुपया प्रती किलो हुई करती थी।  तो कोरोना कि अफवा आणे के बाद यही खरेदी ४० से ५० रुपये हो गयी। 




भारत सरकार एवं राज्य सरकारो ने कोरोना कि अफवाओ के संदर्भ मे स्पष्टीकारण देणे के बाद पोल्ट्री फार्मर कि उम्मीद बाजार पावस आणे कि थी।  मगर २ महिना बित ने के बाद भी बाजार लागत खर्च से ७५ गुना नुकसान सेह के मुर्गी पालक को बेचना पड रहा है। 

उन्होने बताया कि "न्यूट्रीक्राफ्ट पोल्ट्रीफीड" खिलाने से बाकी कंपनी के तुलना मे लागत खर्च फिलहाल के कंडीशन मे कम आणे से पोल्ट्रीफार्मर के कूच पैसे बचत हो रहे है।  लेकीन भिर भी मुर्गीयो कि डिमांड घटी नही। बाजार मे चिल्लर विक्रेता मुर्गी काट के १७० से १८० रुपये प्रती किलो बेच रहे है। यह रेट तो कोरोना कि अफवा आने से पहिलेही था । मगर कोरोना कि अफवा आणे के बाद मुर्गी पालक से ३० रुपया प्रती किलो कम रेट मे मुर्गी खरेदी केरने के बाद भी बाजार मे पहलेके हि रेट मे बेचा जा रहा है। 
तो बडे बडे हॉटेलोमे भी चिकन हंडी तंदुरी और बाकी के डिशेश कि किमते पहलेकी तरह है।  
अनुमान लगाये जाणे पर खरेदी किंमत वर विक्री किंमत मे जो फरक नजर आ राहा है उमेसे हम यही अनुमान लगा सकते कि आखिर पहले के हि रेट मे बिक्री हो रही है ,तो फिर बीच मे कि मलाई खा कौन रहा है?चिकन ट्रेडर्स? या फिर चिल्लर विक्रेता? 

पूरे देश में ब्रॉयलर का उत्पादन बढ़ रहा है।  चिकन के बढ़ते अपप्रचार के कारण खपत में भी कमी आई है। एक अंडे की औसत उत्पादन लागत 4 रुपये है। और फार्म की लिफ्टिंग 3 रुपये है।प्रति दिन हजार अंडे की उत्पादन क्षमता वाले किसान को एक हजार रुपये प्रतिदिन के नुकसान के साथ अपना व्यवसाय जारी रखना पड़ रहा है।

रियायती दरों पर फीड की आपूर्ति
बर्ड फीड के लिए रियायती दरों पर अतिरिक्त गेहूं, चावल,की आपूर्ति कि जणी चाहिये।  समाचार रिपोर्टों के अनुसार, सरकार से गेहूं, चावल का  स्टॉक ७ साल के उच्च स्तर पर पहुंच गया है।इसके अलावा, इस साल दोनों फसलों की सबसे अधिक पैदावार होने की उम्मीद है।सरकार से मुर्गीपालन उद्योग को मदद की उम्मीद है।

ऋण पुनर्गठन की जरूरत
चालू वित्त वर्ष के दौरान कच्चे माल में मुद्रास्फीति के कारण कोरोना अफवाह ने मुर्गियों के लिए बाजार को कम कर दिया, जबकि पोल्ट्री उद्योग पहले से हि नुकसान में था,परिणामस्वरूप,मौजूदा पूंजी, जो पहले से ही घाटे में है, वो अब समाप्त हो गई है, इसलिए नए ऋण की उपलब्धता और पुराने ऋण के पुनर्गठन को उपलब्ध कराया जाना चाहिए।इससे पहले, २००६ के बर्ड फ्लू के संकट में ऋण पुनर्गठन के कारण पोल्ट्री उद्योग संकट से बाहर आ गया था।

भारत कि पोल्ट्री के इस स्थिती को देख के कोण चुरा रहा है पोल्ट्री फार्मर का पैसा? आप को खुद्द समजणे कि जरुरत है।  पहलेहि अमेरिका का फोझन चिकन भारत के बाजार मे आणे से भारत मे 60,000 करोड़ के पोल्ट्री उद्योग का सालाना संकट पैदा सो सकता है ।  ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है।

देश में पोल्ट्री उद्योग के लिए मक्का के कुल उत्पादन का लगभग 60 से 70 प्रतिशत सोयाबीन की खपत होती है। जैसे-जैसे मक्का और फलियों के उत्पादन की लागत अधिक होती है, दुनिया में बेचने का सवाल उठेगा और किसानों को गिरती घरेलू कीमतों का बोझ उठाना पड़ेगा।


मुर्गीपालन करने वाले लोगों के लिए यह दोहरा झटका है, क्योंकि पिछली सर्दियों के मौसम की तुलना में मुर्गी चारे की कीमतें ४५-५५ फीसदी अधिक हैं. 
कोरोना कि अफवा ने लगाया पोल्ट्री को ६०० करोड का चुना
महाराष्ट्र में पोल्ट्री उद्योग और संबंधित वस्तुओं की कीमतें १५ दिनों के भीतर, में 600 करोड़ रुपये की गिरावट आई।गुजरात, मध्य प्रदेश, दिल्ली और दक्षिण भारत में ब्रायलर मुर्गियों का उत्पादन कम होने के कारण, इन राज्यों में बिक्री के लिए मुर्गियाँ भेजी जा रही हैं।महाराष्ट्र राज्य में, हर महीने चार कोटी मुर्गियाँ पैदा होती हैं।मुर्गियों की कीमत 35 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंचने के कारण ब्रायलर चिकन उद्योग को १५० से २०० करोड रुपये का नुकसान हुआ है।वहीं, मक्का और सोयाबीन के भाव में 300 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट आई। इसके किसानों को 400 करोड़ का नुकसान हुआ।

नेशनल एग कोऑर्डिनेशन कमेटी (NEC) के आंकड़ों के अनु सार, अंडे की कीमतें एक साल पहले के मुकाबले लगभग 15 फीसदी कम हैं. नेशनल एग कोऑर्डिनेशन कमेटी (NECC) के आंकड़ों के हिसाब से अहमदाबाद में अंडे की कीमतें फरवरी 2019 के मुकाबले 14 फीसदी कम हैं, जबकि मुंबई में यह 13 फीसदी, चेन्नई में 12 फीसदी और वारंगल (आंध्र प्रदेश) में 16 फीसदी कम है.
चुजा कंपनी घाटे मे 

पोल्ट्री किसानों के साथ इस व्यवसाय से जुड़ी बड़ी कंपनियां भी घाटे में हैं।  चूजों को सप्लाई करने वाली कंपनी  हैचरी  "पोल्ट्री उद्योग मंदी के दौर से गुजर रहा है अब इसको कोई पालना ही नहीं चाहता है।

महाराष्ट्र मे ६० प्रतिषद पोल्ट्री फार्म  बंद हो गए। जो  चल रहे हैं, उनको भी चलाने में दिक्कत आ रही है जबकि कंपनी चूजा, फीड और दवा की लगात खुद उठाती है लेकिन कंपनी ही घाटे में तो किसान को पालने के लिए भी नही दे सक रही है।"

 देश में कई कंपनियां किसानों से ठेके पर अंडा-चिकन पालन करवाती हैं। इस काम में जगह, स्ट्रक्चर और देखरेख किसान की होती है, वहीं चूजा, फीड और दवा की लागत कंपनियां उठाती हैं। बदलते में किसान को तैयार चूजे पर प्रति किलो के हिसाब से कमीशन मिलता है। जैसे   कई इलाकों में ये 6 रुपए किलो है तो कई ७ रुपया।

जनकरो कि माने तो आनेवाले होली तर यह पोल्ट्री बाजार ऐसेही घाटे मे चलणे कि संभावना है ।  होली के बाद बाजार उठणेंकी संभावना जताई जा रही है.



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